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Tuesday, January 19, 2016

4th Chapter 12th Sloka

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥४.१२॥

kāṅkṣantaḥ karmaṇāṃ siddhiṃ yajanta iha devatāḥ |
kṣipraṃ hi mānuṣe loke siddhirbhavati karmajā ||4.12||

काङ्क्षन्तः 1/3 कर्मणाम् 6/3 सिद्धिम् 2/1 यजन्ते III/3 इह 0 देवताः 2/3
क्षिप्रम् 0 हि 0 मानुषे 7/1 लोके 7/1 सिद्धिः 1/1 भवति III/1 कर्मजा 1/1 ॥४.१२॥


·         काङ्क्षन्तः [kāṅkṣantaḥ] = those who are desiring = काङ्क्षत् (m.) + कर्तरि to यजन्ते 1/3
·         कर्मणाम् [karmaṇām] = of actions = कर्मन् (n.) + सम्बन्धे to सिद्धिम् 6/1          
·         सिद्धिम् [siddhim] = result = सिद्धि (f.) + कर्मणि to काङ्क्षन्तः 2/1          
·         यजन्ते [yajante] = worship = यज् to worship + लट्/कर्तरि/III/3   
·         इह [iha] = here = अव्ययम्       
·         देवताः [devatāḥ] = the gods = देवता (f.) + कर्मणि to यजन्ते 2/3         
·         क्षिप्रम् [kṣipram] = quickly = अव्ययम्
·         हि [hi] = very = अव्ययम्         
·         मानुषे [mānuṣe] = of human = मानुष (m.) + adj. to लोके 7/1
·         लोके [loke] = world = लोक (m.) + अधिकरणे to भवति 7/1
·         सिद्धिः [siddhiḥ] = result = सिद्धि (f.) + 1/1  
·         भवति [bhavati] = comes = भू to be + लट्/कर्तरि/III/1        
·         कर्मजा [karmajā] = born of action = कर्मजा (f.) + 1/1          


Desiring the result of actions here (in this world), they worship the gods. For, in the human world, result born of action comes very quickly.


Sentence 1:
कर्मणाम् 6/3 सिद्धिम् 2/1 इह 0 काङ्क्षन्तः 1/3 देवताः 2/3 यजन्ते III/3
Desiring (काङ्क्षन्तः 1/3) the result (सिद्धिम् 2/1) of actions (कर्मणाम् 6/3) here (in this world) (इह 0), they worship (यजन्ते III/3) the gods (देवताः 2/3).


Sentence 2:
क्षिप्रम् 0 हि 0 मानुषे 7/1 लोके 7/1 सिद्धिः 1/1 भवति III/1 कर्मजा 1/1 ॥४.१२॥
For, in the human (मानुषे 7/1) world (लोके 7/1), result (सिद्धिः 1/1) born of action (कर्मजा 1/1) comes (भवति III/1) very (हि 0) quickly (क्षिप्रम् 0).

यदि 0 तव 6/1 ईश्वरस्य 6/1 रागादि-दोष-अभावात् 5/1 सर्व-प्राणिषु 7/3 अनुजिघृक्षायाम् 7/1 (अनु + ग्रह् to bless + सन् to desire … + अङ् भावे = the desire to bless) तुल्यायाम् S7/1 सर्व-फल-प्रदान-समर्थे S7/1 0 त्वयि A7/1 सति 7/1 वासुदेवः 1/1 सर्वम् 1/1इति 0 ज्ञानेन 3/1 एव 0 मुमुक्षवः 1/3 सन्तः 1/3 कस्मात् 5/1 त्वाम् 2/1 एव 0 सर्वे 1/3 0 प्रतिपद्यन्ते III/3 ? इति 0 शृणु II/1 तत्र 0 कारणम् 2/1 --
काङ्क्षन्तः 1/3 अभीप्सन्तः 1/3 कर्मणाम् 6/3 सिद्धिम् 2/1 फल-निष्पत्तिम् 2/1 प्रार्थयन्तः 1/3 यजन्ते III/3 इह 0 अस्मिन् 7/1 लोके 7/1 देवताः 2/3 इन्द्र-अग्नि-आद्याः 2/3 । “अथ 0 यः 1/1 अन्याम् 2/1 देवताम् 2/1 उपास्ते III/1 अन्यः 1/1 असौ 1/1 अन्यः 1/1 अहम् 1/1 अस्मि I/1 इति 0 0 सः 1/1 वेद III/1 यथा 0 पशुः 1/1 एवम् 0 सः 1/1 देवानाम् 6/3 (बृ. उ. 1.4.10) इति 0 श्रुतेः 5/1 तेषाम्ब् 6/3 हि 0 भिन्न-देवता-याजिनाम् 6/3 फल-आकाङ्क्षिणाम् 6/3 क्षिप्रम् 0 शीघ्रम् 0 हि 0 यस्मात् 5/1 मानुषे 7/1 लोके 7/1 । मनुष्य-लोके 7/1 हि 0 शास्त्र-अधिकारः 1/1 “क्षिप्रं हि मानुषे लोके” इति 0 विशेषणात् 5/1 अन्येषु 7/3 अपि 0 कर्म-फल-सिद्धिम् 2/1 दर्शयति III/1 भगवान् 1/1 मानुषे 7/1 लोके 7/1 वर्ण-आश्रमादि-कर्माणि 1/3 इति 0 विशेषः 1/1 । तेषाम् 6/3 वर्ण-आश्रमादि-अधिकारि-कर्मणाम् 6/3 फल-सिद्धिः 1/1 क्षिप्रम् 0 भवति III/1 कर्मजा 1/1 कर्मणः 6/1 जाता 1/1


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