पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ ९.२६ ॥
patraṃ puṣpaṃ phalaṃ toyaṃ yo me bhaktyā prayacchati |
tadahaṃ bhaktyupahṛtamaśnāmi prayatātmanaḥ || 9.26 ||
पत्रम् 2/1 पुष्पम् 2/1 फलम् 2/1 तोयम् 2/1 यः 1/1 मे 4/1 भक्त्या 3/1 प्रयच्छति III/1 ।
तत् 2/1 अहम् 1/1 भक्त्युपहृतम् 2/1 अश्नामि I/1 प्रयतात्मनः 6/1 ॥ ९.२६ ॥
· पत्रम् [patram] = a leaf = + कर्मणि to प्रयच्छति 2/1
· पुष्पम् [puṣpam] = a flower = + कर्मणि to प्रयच्छति 2/1
· फलम् [phalam] = a fruit = + कर्मणि to प्रयच्छति 2/1
· तोयम् [toyam] = water = + कर्मणि to प्रयच्छति 2/1
· यः [yaḥ] = he who = यद् m. + कर्तरि to प्रयच्छति 1/1
· मे [me] = me = अस्मद् m. + सम्प्रदाने to प्रयच्छति 4/1
· भक्त्या [bhaktyā] = with devotion = भक्ति (f.) + करणे to प्रयच्छति 3/1
· प्रयच्छति [prayacchati] = offers = प्र + दाण् दाने (1P) to give + लट्/कर्तरि/III/1
o दाण् + शप् + तिप्
यच्छ + अ + ति 7.2.78 पाघ्राध्मास्थाम्नादाण्दृश्यर्त्तिसर्त्तिशदसदां पिबजिघ्रधमतिष्ठमनयच्छपश्यर्च्छधौशीयसीदाः । ~ शिति
· तत् [tat] = that = तद् n. + adj. to भक्त्युपहृतम् 2/1
· अहम् [aham] = I = अस्मद् m. + कर्तरि to अश्नामि 1/1
· भक्त्युपहृतम् [bhaktyupahṛtam] = offering imbued with the devotion = भक्त्युपहृत n. + कर्मणि to अश्नामि 2/1
· अश्नामि [aśnāmi] = receive = अश् (9P) + लट्/कर्तरि/I/1
· प्रयतात्मनः [prayatātmanaḥ] = of the person whose mind is pure = प्रयतात्मन् (m.) + सम्बन्धे to भक्त्युपहृतम् 6/1
He who offers me with devotion – a leaf, a flower, a fruit, water – I receive that offering imbued with the devotion of the person whose mind is pure.
Sentence 1:
यः 1/1 पत्रम् 2/1 पुष्पम् 2/1 फलम् 2/1 तोयम् 2/1 मे 4/1 भक्त्या 3/1 प्रयच्छति III/1 ।
अहम् 1/1 तत् 2/1 प्रयतात्मनः 6/1 भक्त्युपहृतम् 2/1 अश्नामि I/1 ॥ ९.२६ ॥
He who (यः 1/1) offers (प्रयच्छति III/1) me (मे 4/1) with devotion (भक्त्या 3/1) – a leaf (पत्रम् 2/1), a flower (पुष्पम् 2/1), a fruit (फलम् 2/1), water (तोयम् 2/1) – I (अहम् 1/1) receive (अश्नामि I/1) that (तत् 2/1) offering imbued with the devotion (भक्त्युपहृतम् 2/1) of the person whose mind is pure (प्रयतात्मनः 6/1)
न केवलं मद्भक्तानाम् अनावृत्तिलक्षणम् अनन्तफलम् , सुखाराधनश्च अहम् । कथम् ? —
पत्रं पुष्पं फलं तोयम् उदकं यः मे मह्यं भक्त्या प्रयच्छति, तत् अहं पत्रादि भक्त्या उपहृतं भक्तिपूर्वकं प्रापितं भक्त्युपहृतम् अश्नामि गृह्णामि प्रयतात्मनः शुद्धबुद्धेः ॥ २६ ॥